Friday, 7 March 2014

समाज में नारी की जगह

दोस्तों नारी का नाम सुनते ही वो कई रूपों में हमारे सामने आकर साक्षात हो जाती है.किसी की माँ,किसी की बहन तो किसी की पत्नी.और हाँ सब में बढ़ कर वो अपने आप में एक स्वतंत्र व्यक्तित्व लिए एक नारी होती है.लेकिन आज जो महिलाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौति है वह यह कि पुरुष उन्हें एक स्वतंत्र व्यकतित्व मानने  के लिए तैया ही नही है .प्रकृति ने इंसान की ज़िन्दगी के दो पहिये बनाई है.पुरुष और नारी.
सोंचिये अगर स्कूटर का एक पहिया निकाल दिया जाये तो क्या होगा?सीधा सा उत्तर है कि स्कूटर एक कदम भी आगे नहीं बढ़ पायेगा.ये दोनों पहिया एक दोसरे को सहयोग करतें है तभी आगे बढ़ पातें हैं.वैसे ही दोस्तों नर और नारी भी है.ये दोनों ऐसे दो पहिये हैं जिनमें से एक के बिना भी जीवन रुपी गाड़ी  एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकती.
इसके पीछे करण किया है?आखिर वो कौन सी सकती है जो संसार के इक्कीसवीं सदी में कदम डाल देने के बाद भी महिलाओं के विकास में रोडें अटका रही है?कहीं महिला खुद भी ऐसी शक्ति को स्वीकृति अप्रत्यक्ष रूप से तो नहीं दे रहीं हैं?मैं महिलाओं को भी उनकी इस स्थति के लिए जिम्मेवार मानता हूँ.यह आरोप तब सहज ही साबित हो जाता है जब अपनी सास ही बहु को कम दहेज़ लाने के कारण आग के हवाले या छत से कूद कर जान देने के लिए मजबूर करती है.इससे यह साबित होता है कि महिला को केवल पुरुष से ही नहीं बल्कि अपने आप से भी लड़ना है.
इसके साथ ही मैं यह भी कहना चाहूँगा कि ऐसा नहीं है कि महिलाओं की स्थिति में आज ज़रा भी सुधार नहीं आया है,सुधार तो अवश्य आया है पर यह कह देना उचित नहीं होगा कि महिलाओं को उनका उचित स्थान दे दिया गया है.महिलाओं को यदि अपने आप को सशक्त करना है तो उन्हें पुरुष द्वारा बिछाए गए जाल को पहचानना होगा.न केवल पहचानना बल्कि उसे काटना भी होगा.

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