शिक्षा एक ऐसा हथियार है,जो अंधविश्वासों को दूर करती है और साथ ही
अज्ञानता को भी भी मिटाने का काम करती करती है.सामान्यतया जहाँ शिक्षा होती है
वहां रूढ़िवादिता भी कम होती है.अगर आज संसार का एक बहुत बड़ा तबका पिछड़ा हुआ है तो
उसमें भी कहीं न कहीं शिक्षा का बहुत बड़ा हाथ है.जो वर्ग
शिक्षित होतें हैं सारी शक्ति उन्ही के पास होती है.भारत में महिला व दलित दोनों आर्थिक व
सामाजिक दोनों रूप से पिछड़े हुए हैं तो उसमें कहीं न कहीं सिक्षा की भी बहुत बड़ी भूमिका है.
यदि हम प्राचीन काल में देखे तो अवश्य ही कुछ शिक्षित महिलाएं मिल जांएगी पर
ऐसी महिलाओं की संख्या ऊँगली पर गिनने लायक है.यदि आप इतिहास पढेंगे तो आप को कुछ
ही विद्वान महिलाओं के बारें में घुमा-फिराकर बताया जाता है.इनमें से कुछ गार्गी,घोषा,इन्द्राणी
आदि प्रमुख है.
खैर ये तो बीतें हुए कल की बातें हैं जो कभी लौट कर नहीं आती.पर यदि वर्तमान
में भी देखें तो स्त्री-पुरुष शिक्षा के अनुपात में भारी अंतर है.भारतीय शहरों का
तो ठीक ठाक हाल फिर भी कहा जा सकता है,किन्तु जब हम ग्रामीण भारत की बात करतें हैं तो समस्या कुछ
ज़्यादा ही विकराल है.सबसे पहली बात की भारत की सत्तर प्रतिशत से अधिक आवादी गांवों
में निवास करती है जहाँ स्त्री-शिक्षा का बहुत ही बुड़ा हाल है.जागरूकता की कमी व
अति-रूढ़िवादिता के कारण माँ-बाप खासकर अपनी बालिकाओं को स्कूल नहीं भेजतें
हैं.भारतीय गांवों में लोग यह मान कर चलते हैं कि बेटी को ज़्यादा पढ़ाने से बिगड़
सकती है.और भी न जाने किस-किस तरह की सोंच लोगों में घर कर चुकी है.
यदि आधी आवादी को शिक्षा से महरूम किया जा रहा है तो इसको किसी भी दृष्टि से
बुद्धिमानी इस आधी आवादी को सशक्त नहीं किया जा सकता है सकता.इसके लिए हमारी सरकार
को व साथ ही साथ आम लोगों को भी पप्रतिबद्ध होने की आवश्यकता है.हाँ मैं एक बात और
कहना चाहूंगा की जो महिलाये समाज के में याक स्थान पा चुकीं हैं उनका यह दायित्व
है कि समाज की उन महिलाओं का को आगे लाने में सहयोग दे जो आज भी किसी न किसी कारन
से पिछड़ी हुई है.जो महिलाऐं आर्थिक रूप से मज़बूत स्थति में हैं वें गरीब बालिकाओ को आर्थिक से मदद करके भी शिक्षा प्राप्त
करने में मदद कर सकती हैं.
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